वो कहेते है के तुम नहीं हो इसलिए मैं कवी हु
उन्हें क्या बताऊ के तुम्हारे बिना मैं सिर्फ अपनी एक छवि हु
सुरेन्द्र
Jan 2013
वो कहेते है के तुम नहीं हो इसलिए मैं कवी हु
उन्हें क्या बताऊ के तुम्हारे बिना मैं सिर्फ अपनी एक छवि हु
सुरेन्द्र
Jan 2013
4 lines for times when we are not sure where life is taking us
खुदा क्या चाहता है, ये शायद साला वो खुद भी नहीं जानता
और दुनिया माने या न माने , मैं उसे नहीं मानता
सुरेन्द्र
दिसम्बर २०१२
This is a poetic tribute to Sachin Tendulkar and a generation that loved him
एक जमान था जब हम २ सवाल पूछा करते थे
एक ‘स्कोर क्या हुआ है’ और दूसरा ‘तेंदुलकर है’ ?
आज तेंदुलकर नहीं तो पहला सवाल पूछने का मन ही नहीं करता
और इंडिया कितने भी रन बना ले , आजकल हमारा दिल नहीं भरता !!
तुम क्या जानो के तेंदुलकर हमारे लिए क्या था
हमेशा की डूबती हुई नय्या का वो एक ही तो सहारा था…
तेंदुलकर हमारा ख्वाब और हमारी सच्चाई भी था
और क्या बताऊ तुम्हे वो हमारे दर्द की वजह और हमारी ख़ुशी का इन्तेजाम था!!
तेंदुलकर के रिटायर होने पे तुम खुश हो सकते हो
तुम्हारे पास द्रविड़, गांगुली, लक्ष्मण, धोनी, युवराज, रैना जो थे…
पर हमे माफ़ करना, हम गम छुपा नहीं सकते
क्यों की आज की दुनिया मैं अब और तेंदुलकर नहीं बनते !!
तुम क्या जानो के तेंदुलकर हमारे लिए क्या था
वो हमारे सब सवाल और सब सवालों का जवाब था…
सच कहेता हु यारों दुनिया के हजारों Goliath थो के लिए
हमारे पास हमेशा वो सिर्फ एक ही तो davidथा!!
सुरेन्द्र
दिसम्बर २०१२
खूप दिवसात काही लिहिलं नाही, लिहावं असं काही घडलचं नाही
कुणी गालातल्या गालात हसलं नाही, कि धाय मोकलून रडलं नाही
सगळं कसं शांत आहे, कळत नाही कि वादळ मागे आहे कि पुढे आहे
आभाळ आणि मन दोन्ही भरून आलय, पाउस काही पडणार याची मात्र खबर नाही
हरवलं काहीच नाहीये, पण सगळेच काहीतरी शोधतायत
ऐकत कुणीच नाहीये, पण सगळेच काहीतरी बोलतायत
एवढ्या सगळ्या धावपळीत भावना कुठे तरी कोमेजतायत
गर्दी वाढलीये, पण माणस कुठेतरी हरवतायत!!
सुरेंद्र
मे २०१२
An effort to document the reasons where people find inspirations to write poems.
कविता म्हणजे सोप्या भावना कठीण शद्बात व्यक्त करणं आणि जुळत नसलं तरी यमक जुळवत रहाणं
कविता म्हणजे शब्दांच्या गर्दीत भावना लपवणं आणि सांगता येत नसेल तर सांगायचा प्रयत्न करत रहाणं
कविता म्हणजे सत्य कळत असेल तरी स्वप्नातच जगण्याचा हव्यास आणि कविता म्हणजे चौखूर उधळणाऱ्या मनाला हळुवार घातलेला लगाम
कविता म्हणजे तू नसताना असल्याची जाणीव आणि कधी कधी तू असतानाही जाणवलेली तुझी उणीव
कविता म्हणजे एक भास आणि कधी कधी मनाला झालेला त्रास कविता म्हणजे एक व्यंग आणि कधी कधी मनात उठलेले तरंग
कविता म्हणजे प्रेम आणि कधी कधी चुकलेला नेम कविता म्हणेज रंगलेला डाव आणि कधी कधी विस्कटलेला गेम
कविता म्हणजे आपण दोघे आणि कधी कधी फ़क़्त मी कविता म्हणजे बहरलेलं झाड आणि कधी सुकून गेलेली बी
कविता म्हणेज मनानी घेतलेला झोका आणि कधी कधी हुर्दयाचा चुकलेला ठोका खरच सांगतो तुला कविता म्हणजे मनाला लागलेली एक आस आणि कधी कधी फ़क़्त timepass
Surendra ( June 2012)
न मैं आपको तब जानता था, न मैं आपको अब जानता हु
पर इस बीच जो गुजरा , वो एक हसीं सपना था ये जरुर मानता हु
आप बिछड़े कुछ इस तरह के अब लगता है के काश आप मिले ही न होते
बोहोत सारी खुशियों के बाद हमारी जिंदगी मैं ये आसूं तो न होते..
आपकी आखों में नफरत देखकर हुआ है आज ये एहसास,
शायद मेरे दोस्त, तुजे हमेशा से ही थी और किसी की तलाश..
मिलेंगे जिंदगी में कभी तो बस इतना रखना याद
भले २ पल के लिए ही सही , हमारा आपका रहा साथ
सुरेन्द्र फाटक
मार्च २००४
जिंदगी गयी तेल लेने, और मौत जाये भाड में !!
कौन यहाँ रुका है , किसी की याद में !!
सूरज निकले सुबह, या चाँद निकले रात में
तुझे तो आखिर मिलना ही है , तेरी चिता की राख में
सुरेन्द्र
Dec 2012
This poem is about the horrible incidence that took place in Delhi and how we as a nation have reacted to it. This poem tries to showcase how we are reacting and how we can react.
ये कविता है दिल्ली मैं दिसम्बर २०१२ मैं घटी घटना और उसपर हमारी प्रतिकियाओं पर … हम बगावत कैसे कर रहे है और हम कैसे कर सकते है ये कहेने की एक कोशिश ….
चलो आज थोड़ी बगावत करते है
कोई एक फेसबुक स्टेटस हम भी शेयर करते है
किसी नेता को भी आज हम थोड़ी गलियां देते है
थोड़ी और हिम्मत हुई तो कही जा के मोमबत्तियां जलाते है
चलो आज थोड़ी बगावत करते है
हम भी फोटोशोप मैं कोई फोटो बना के शेयर करते है
कोई विडियो ढूंड के उस पे कमेंट करते है
थोड़ी और हिम्मत हुई तो किसी रैली मैं शामिल हो जाते है
चलो आज थोड़ी बगावत करते है
हम भी किसी चीज़ की शपथ लेते है
कोई पिटीशन ढूंड के उसे support करते है
और थोड़ी और हिम्मत हुई तो थोडी नारेबाजी हम भी कर लेते है
चलो आज थोड़ी और बगावत करते है
खुद को भी जरा हम आईने मैं देखते है
खुद से ही थोडा बदलाव हम शुरू करते है
और थोड़ी और हिम्मत हुई तो वक़्त आने पर हिम्मत भी दिखाते है
सुरेन्द्र
दिसम्बर २०१२